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तेरे साथ रहूँगा मैं..

आज हूँ, कल नहीं रहूँगा मैं.
ख़ाक बनकर हवा में उड़ता रहूँगा मैं.. 

कभी धूल का गुबार बनकर बाहों में भर लूँगा,
कभी आँखों में किरकिरी बनकर तुझे परेशान करूंगा मैं..

कभी पहली बारिश में सौंधी खुशबू बनूँगा,
फिर छज्जे से गिरती बूँद के साथ जुड़कर तुझे छू लूँगा मैं..

हर राह पर तेरे क़दमों के साथ चलूँगा,
पलकों के बाल पर मांगी तेरी दुआ भी खुदा तक पहुचाऊँगा मैं..

जब रुखसत करोगी खुद को ज़िन्दगी से,
किसी अपने के हाथों तुझ पर गिरूंगा और तेरा हो जाऊंगा मैं..
तेरे साथ रहूँगा मैं... 

12/02/2012

Comments

Deepa said…
Kya baat hai Nausha miya,it did hit my soul... loved it..
Nikhil said…
Bas kar bhai, Ab rulayega kya .....!

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अटल

डूब रहा था क्षितिज पर सूर्य,  चंद्रमा पटल पर आने में झिझकता, लड़ रहा था योद्धा मृत्यु से,  मन से मुस्कुराता, ना कि तड़पता। जानता था, वो कहीं नहीं जा रहा है।  वो तो वट वृक्ष है जिसकी जड़ें गहरी उतरी है मनों में। वो तो नए पौधों - बेलों को बनाता है, पक्षियों को स्थान देता है, बढ़ते देखता है। तुम्हारे विचारो की अनगिनत जड़ों से जन्मा हूं,  मूल्यों के तने को थामे जीवन चढ़ा हूं, कविताओं की शाखाओं पर झूला हूं, तुम 'अक्षयवट' की छाव में मिट्टी थामे खड़ा हूं । तुम मुझमें अजर हो। तुम  मुझमें  अमर हो। विश्वास के रूप में तुम में मैं अटल हूं, विचार के रूप में मुझमें तुम अटल हो। बेंगलुरू १६/०८/२०१८

अभिव्यक्ति

जब मन के  महासागर में तूफ़ान सा मच उठता है, मानो देव-दानव सागर मंथन कर रहे हों..  कितना कुछ आता है सतह पर यूँही, लेकिन न उसकी आकृति समझ आती है, न प्रकृति ।  कभी-कभी विष भी निकलता है, राग, द्वेष, पीड़ा, कुंठा का  और स्वयं शिव बनकर पीना पड़ता है ।  मनसागर के मंथन में डूब जाता है सब कुछ, अहम भी... स्वयं भी .. जब लील लेता है ये सागर अपने आप में..    और डूबकर छटपटाहट समाप्त होती है,  तब अमृत निकलता है ...  और मिलती है.. अभिव्यक्ति  बैंगलुरु  १५ - फरवरी - २०१६ 

Letter To Long Lost Friend

एक अर्से से तुमको देखा नहीं दोस्त .. अब इतने दूर हैं कि यादो में भी एक दुसरे का रास्ता नहीं भूलते ! याद तो नहीं कि आखरी बार तुम्हे कब देखा था पर हाँ शक्ल याद है, आवाज़ याद है.. अंदाज़ याद है..  अब भी वैसे ही लगते हो.. मासूम छोटे बच्चे से! कमाल है कि तुम अब भी उतने ही हो, और मैं हूँ कि बढ़ता जा रहा हूँ! ये याद भी बड़ी मज़ेदार चीज़ है, वक्त भी रोककर रख लेती है. वर्ना एक मैं.. जिसके हाथ से वक्त यूँ फिसलता है कि रेत भी शर्मा जाए. कम्बख्त ये वक्त शायद मेरे पास ही यूँ तेल चुपड़ कर आता है,  मानो कुश्ती लड़ने आया हो मुझसे!  हाँ.. वैसे वो लड़ता भी है.. पछाड़ता भी है.. और जैसे ही मैं सोचता हूँ कि अब इसे पकड़कर पटखनी दे दूंगा, सरसराता हुआ हाथ से निकल जाता है..  मेरा बचपन भी यूँही हाथों से कहीं फिसल गया है  शायद तुम्हारी यादों में महफूज़ हो ! क्यूँ न यूँ करैं कि फिर मिलें, और लौटा दें एक दुसरे को  अपना-अपना बचपन.. अपनी-अपनी मासूमियत ! चलो अब आ भी जाओ  एक अर्से से तुमको देखा नहीं दोस्त! ...