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अभिव्यक्ति


जब मन के महासागर में तूफ़ान सा मच उठता है,
मानो देव-दानव सागर मंथन कर रहे हों.. 

कितना कुछ आता है सतह पर यूँही,
लेकिन न उसकी आकृति समझ आती है, न प्रकृति । 

कभी-कभी विष भी निकलता है, राग, द्वेष, पीड़ा, कुंठा का 
और स्वयं शिव बनकर पीना पड़ता है । 

मनसागर के मंथन में डूब जाता है सब कुछ,
अहम भी... स्वयं भी ..

जब लील लेता है ये सागर अपने आप में..   
और डूबकर छटपटाहट समाप्त होती है, 
तब अमृत निकलता है ... 
और मिलती है.. अभिव्यक्ति 

बैंगलुरु 
१५ - फरवरी - २०१६ 

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अटल

डूब रहा था क्षितिज पर सूर्य,  चंद्रमा पटल पर आने में झिझकता, लड़ रहा था योद्धा मृत्यु से,  मन से मुस्कुराता, ना कि तड़पता। जानता था, वो कहीं नहीं जा रहा है।  वो तो वट वृक्ष है जिसकी जड़ें गहरी उतरी है मनों में। वो तो नए पौधों - बेलों को बनाता है, पक्षियों को स्थान देता है, बढ़ते देखता है। तुम्हारे विचारो की अनगिनत जड़ों से जन्मा हूं,  मूल्यों के तने को थामे जीवन चढ़ा हूं, कविताओं की शाखाओं पर झूला हूं, तुम 'अक्षयवट' की छाव में मिट्टी थामे खड़ा हूं । तुम मुझमें अजर हो। तुम  मुझमें  अमर हो। विश्वास के रूप में तुम में मैं अटल हूं, विचार के रूप में मुझमें तुम अटल हो। बेंगलुरू १६/०८/२०१८

Letter To Long Lost Friend

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