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दास्ताँ - ऐ - जाम

क्या कहें ऐ साकी कब से पीना शुरू किया
जब मौत ने बुलावा भेजा तब से जीना शुरू किया ।

ज़िंदगी बीत गई काम करते हुए
कहता है वक्त अब जाम भरते हुए
ज़िंदगी भर के ज़ख्म अब सीने से झांकते है
हर जाम के साथ चाक-ऐ -जिगर सीना शुरू किया।

उसको ज़िंदगी मे आते देखकर हाथ रुक गया था
उसके हुस्न के आगे यह जाम झुक गया था
आंखो के नशे को जाम मे समेटता रहा
उसे जाते देखकर फ़िर पीना शुरू किया

११/०३/०८

Comments

life said…
wah baba wah....mast likha hai .....
Rahul said…
Baba bas yaar tumne to kamaal kar diya

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अटल

डूब रहा था क्षितिज पर सूर्य,  चंद्रमा पटल पर आने में झिझकता, लड़ रहा था योद्धा मृत्यु से,  मन से मुस्कुराता, ना कि तड़पता। जानता था, वो कहीं नहीं जा रहा है।  वो तो वट वृक्ष है जिसकी जड़ें गहरी उतरी है मनों में। वो तो नए पौधों - बेलों को बनाता है, पक्षियों को स्थान देता है, बढ़ते देखता है। तुम्हारे विचारो की अनगिनत जड़ों से जन्मा हूं,  मूल्यों के तने को थामे जीवन चढ़ा हूं, कविताओं की शाखाओं पर झूला हूं, तुम 'अक्षयवट' की छाव में मिट्टी थामे खड़ा हूं । तुम मुझमें अजर हो। तुम  मुझमें  अमर हो। विश्वास के रूप में तुम में मैं अटल हूं, विचार के रूप में मुझमें तुम अटल हो। बेंगलुरू १६/०८/२०१८

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