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माज़ी (Past)


जाने ये क्यूँ हमेशा साए कि तरह मेरे पीछे-पीछे चलता रहता है !
जहाँ से भी मैं गुज़रता हूँ, पिछले हर कदम की मिटटी पोटली में भर लेता है.

जीत, हार, बनते-बिखरते रिश्ते, ख़ुशी, हंसी, आंसू, आह, दर्द सब सहेज लेता है,
जो सब मैं पीछे फेकता हूँ, वो भी समेट लेता है.. कमबख्त कुछ तो छोड़ दे!

जब भी कभी आँख बंद करता हूँ,  किसी बच्चे कि तरह कूद कर सामने आ जाता है,
और किसी फेरी वाले की तरह पोटली में से चुन-चुन कर सब दिखाता है.

खैर.. कौन समझाए इसे.. 
अनजाने ही सही, मेरा माज़ी मेरा दुश्मन भी है.. दोस्त भी.

मई १५, २०१२ 
पुणे

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अटल

डूब रहा था क्षितिज पर सूर्य,  चंद्रमा पटल पर आने में झिझकता, लड़ रहा था योद्धा मृत्यु से,  मन से मुस्कुराता, ना कि तड़पता। जानता था, वो कहीं नहीं जा रहा है।  वो तो वट वृक्ष है जिसकी जड़ें गहरी उतरी है मनों में। वो तो नए पौधों - बेलों को बनाता है, पक्षियों को स्थान देता है, बढ़ते देखता है। तुम्हारे विचारो की अनगिनत जड़ों से जन्मा हूं,  मूल्यों के तने को थामे जीवन चढ़ा हूं, कविताओं की शाखाओं पर झूला हूं, तुम 'अक्षयवट' की छाव में मिट्टी थामे खड़ा हूं । तुम मुझमें अजर हो। तुम  मुझमें  अमर हो। विश्वास के रूप में तुम में मैं अटल हूं, विचार के रूप में मुझमें तुम अटल हो। बेंगलुरू १६/०८/२०१८

अभिव्यक्ति

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Letter To Long Lost Friend

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