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दोस्तों के नाम :-)

आसमान की डाल से एक मीठा सितारा पक कर गिरा था.
बंद आँखों से.. ख्यालों के पैरों पर उसे पकड़ने को मैं दौड़ा था.
दुआ के हाथों से जब उसे उठाया था..
तब मैंने तुम्हे पाया था..

जब राह अंतहीन थी.. और साथी कोई ना था,
तकलीफों की तपती राह पर उम्मीदों के पाँव जलने लगे थे.
बोझिल आँखों से मैंने अपने लिए भी एक फ़रिश्ते को बुलाया था.
तब मैंने तुम्हे पाया था..

कहते हैं दोस्त इंसान नहीं एक आदत होते हैं,
आदत.. जिनपर आपका कोई ज़ोर नहीं होता..
जब आदतों से जुड़ने का मेरा भी मौका आया था.
तब मैंने तुम्हे पाया था.


Comments

abhishek said…
Nice ....buddy.....
Deepa said…
Dil ko chhu gayi ye kavita !! bahut achhe !!

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अटल

डूब रहा था क्षितिज पर सूर्य,  चंद्रमा पटल पर आने में झिझकता, लड़ रहा था योद्धा मृत्यु से,  मन से मुस्कुराता, ना कि तड़पता। जानता था, वो कहीं नहीं जा रहा है।  वो तो वट वृक्ष है जिसकी जड़ें गहरी उतरी है मनों में। वो तो नए पौधों - बेलों को बनाता है, पक्षियों को स्थान देता है, बढ़ते देखता है। तुम्हारे विचारो की अनगिनत जड़ों से जन्मा हूं,  मूल्यों के तने को थामे जीवन चढ़ा हूं, कविताओं की शाखाओं पर झूला हूं, तुम 'अक्षयवट' की छाव में मिट्टी थामे खड़ा हूं । तुम मुझमें अजर हो। तुम  मुझमें  अमर हो। विश्वास के रूप में तुम में मैं अटल हूं, विचार के रूप में मुझमें तुम अटल हो। बेंगलुरू १६/०८/२०१८

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