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हिंदी

( हिंदी दिवस के अवसर पर )  हिंदी, तुम मेरी प्रथम भाषा नहीं हो,  पर दिल के करीब हो. पहली भाषा तो मैंने सिर्फ आँखों की सीखी थी,  जब आँखों से बहते ख़ुशी के आंसू देखकर परिवार क्या है.. जान लिया था. दूसरी भाषा हँसने-रोने की थी, जब जान गया था कि बिन बोले कैसे अपनी बात मनवानी है.  तीसरी तुम्हारी बहन मराठी थी, जिसने मुझे मेरे पहले २ शब्द दिए थे.. "आई, बाबा" तुम चौथी थी. पर जब तुम आई तो, मेरे विचारो को शब्द मिल गए थे.. तुमने मुझे दोस्त दिए.. मेरी दुनिया का दायरा बढा दिया.. मेरी पहचान तुमसे है.. मेरे विचार तुमसे है.. कहीं मुझमे तुम बसती हो, हमेशा  मेरे साथ चलती हो.. हिंदी, तुम मेरी प्रथम भाषा नहीं हो,  पर दिल के करीब हो! १४ सितम्बर २०१२ ( हिंदी  दिवस) पुणे 

खुदा ताकता है।

कहाँ से मैंने शुरू किया था, कितनी दूर चल निकला हूँ , वक्त ही एक फीता है जो , मेरे पीछे मेरा फासला नापता है। कितने गुनाह सीने मे दफ़न किए थे, और कितनी अच्छियाँ उन आँखों को दिखाई थी, अकेले मे जब मेरा ईमान नंगा होता है, आँखों का पूरा मोहल्ला झांकता है। वक्त से भी दौड़ ना लडूं.. उन सारी आँखों की भी परवाह ना करूँ.. पर ख़ुद से छुपकर जाऊंगा कहाँ .. उसे आँखों की ज़रूरत नही पड़ती, जो अन्दर ज़मीर से मेरा खुदा ताकता है ।।

Half asleep

आँखों की दीवार आधी ढह चुकी थी, ख्वाब, मानो बस देहरी पर खड़े थे कि एक कम उम्र का ख्याल कहीं से दौड़ता हुआ आया, और बिना दस्तक दिए पहले अन्दर आ गया. ख्याल छोटा सा ही था पर किसी तार्किक बच्चे कि तरह, reasons, logic और practicality की बातें करता था. जल्दी मानने वाला नहीं था वो, ये बात ख्वाब को भी पता थी इसलिए खवाब भी बाहर इंतज़ार करते बैठ गया.. इन छोटे ख्यालों से मुझे बेहद चिढ है, ये अकेले नहीं आते. मोहल्ले के बच्चे जैसे चौकलेट बाटने वाले दादाजी को देखते ही १-१ कर जमा हो जाते हैं, बस वैसे ही, १-१ करके आते गए. और मैं उन सबको समझता-समझाता रहा. रात कटती जा रही थी, और मेरी आधी बंद आँखे पूरी बंद नहीं हो पा रही थी. आखिर मैं झल्लाया.. "बस बहुत हुआ, अब जाओ यहाँ से !! मुझे सुबह ऑफिस भी जाना है.." कहकर सारे ख्यालों को भगाया और अपनी comfortable position में लेटकर, आँखे पूरी बंद करके इशारों में खवाब को बोला, "आ जाओ और आते वक्त दरवाज़ा बंद करके आना." उन खयालो ने नींद और मेरे बीच अजीब दीवार खडी कर दी थी, खवाब सिरहाने ही थे, पर मैं सारी रात जाग रहा था.. जून ९, २०१२ ग...

पिकनिक

बचपन में पड़ोस की गली में एक घर था जहां सारे बुज़ुर्ग रहते थे.. सुबह से रात तक बातें ही करते रहते थे.. जाने कितनी बातें थीं उनके पास ! झुर्रियों, धब्बों में चेहरे यूँ खोए थे कि हंसता-रोता चेहरा एक सा ही लगता था.. बाल जितने सफ़ेद थे, आँखों की कटोरियाँ  उतनी ही अँधेरी काली.. जाने किस आहट को सुनकर सब अक्सर गली में "कौन आया" ये देखते रहते थे,  अक्सर तो कोई कहीं और ही होता था, और कभी-कभी तो कोई होता भी नहीं. बड़े कहते थे कि उनके बच्चे  उनको  पिकनिक पर छोड़ कर गए हैं ..  और मैं सोचता था कि काश इतनी लम्बी पिकनिक हमें भी मिल पाती..  बुज़ुर्ग होना बहुत अच्छा होता है.. मैं हमेशा सोचता था की जब बूढा हूँगा तो अपने दोस्तों के साथ ऐसे ही रहूँगा,  पर अब घर से दूर रहकर समझ आता है, कि पिकनिक का पूरा होना बहुत ज़रूरी होता है. घर जाना बहुत ज़रूरी होता है ... घर  होना  बहुत ज़रूरी होता है..  पिकनिक का पूरा होना बहुत ज़रूरी होता है.... मई १५, २०१२  पुणे ...

सूरज का बचपना

अजब बचपना है सूरज का, सुबह सुबह उठकर जिद करने लगता है ! पूरे मोहल्ले को जगा देता है..  किसी आम तोड़ने के लिए चढ़ते बच्चे की तरह जैसे, तने पर धीरे और फिर पहली शाख मिलते ही सरपट ऊपर चढ़ जाता है. फिर पेट भर कर धीरे-धीरे नीचे उतर कर चुपके से ओझल हो जाता है.. दिन भर बहुत हुडदंग मचाता है ये. और फिर शाम ढलते, जब माँ थाली में चाँद परोसकर देती है, खा पी कर रात की रजाई में सिकुड़कर सो जाता है..  तब कहीं ज़मीनी मोहल्ले वाले चैन से सो पाते हैं.  अजब बचपना है सूरज का.... February 5, 2012

सन्नाटा

कल सन्नाटे से सामना हुआ, तो वो ख़ामोशी की चादर ओढ़े बैठा था. मैंने कुछ लफ़्ज़ों से चादर को टटोला, तो मूंह फुलाकर बैठ गया.. दोस्ती का हाथ बढाया तो उसने  मूंह फेर लिया,  एक अरसे से देखा नहीं था तो पहचानने से भी इनकार कर दिया.. फिर मेरे साथ अकेलापन भी आया है देखकर मुस्कुराया, कुछ पुरानी बात चली, तो मौसम ही बन गया.. फिर रात भर मैं, अकेलापन और सन्नाटा  बेलफ्ज़ ज़बां में बात करते रहे, और शराब थी, कि गिलास में गिरते और गले से उतरते हुए शोर मचाती रही... अगली बार हमारी बातों की महफ़िल में शराब को नहीं लायेंगे ... February 4, 2012

तेरे साथ रहूँगा मैं..

आज हूँ, कल नहीं रहूँगा मैं. ख़ाक बनकर हवा में उड़ता रहूँगा मैं..  कभी धूल का गुबार बनकर बाहों में भर लूँगा, कभी आँखों में किरकिरी बनकर तुझे परेशान करूंगा मैं.. कभी पहली बारिश में सौंधी खुशबू बनूँगा, फिर छज्जे से गिरती बूँद के साथ जुड़कर तुझे छू लूँगा मैं.. हर राह पर तेरे क़दमों के साथ चलूँगा, पलकों के बाल पर मांगी तेरी दुआ भी  खुदा तक पहुचाऊँगा मैं.. जब रुखसत करोगी खुद को ज़िन्दगी से, किसी अपने के हाथों तुझ पर गिरूंगा और तेरा हो जाऊंगा मैं.. तेरे साथ रहूँगा मैं...  12/02/2012