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चितकबरी सी ये ज़िन्दगी

चितकबरी सी ये ज़िन्दगी, बहुत कन्फ्यूज़ करती है.. कुछ अर्धसत्य सी लगती है..  जीवन और मृत्यु दोनों ही  सत्य माने जाते हैं , लेकिन मृत्यु किसने देखी है।   हर साल पतझड़ आता है जाने कितनी जाने लेकर जाता है , कौन उसे महामारी कहता है।   बस मनुष्य की अपनी सीमित सोच के अनुरूप सीमित सी लगती है.. चितकबरी सी ये ज़िन्दगी बहुत कन्फ्यूज़ करती है..  कुछ अर्धसत्य सी लगती है..    व्यवहार की परिभाषा अपनी है, दूसरो के लिये है | अपनी आँखों में तो अंतर्मन उधड़ा सा लगता है।  शर्मिंदगी की बैसाखी पर ज़िन्दगी आगे बढ़ती  है| फिर भी मुस्कराहट के साथ आँखे रौशनी से चमकती हैं |   चितकबरी सी ये ज़िन्दगी बहुत कन्फ्यूज़ करती है.. कुछ अर्धसत्य सी लगती है..  बैंगलोर  २८ जुलाई २०१५ 

आओ मिलकर तोड़ें तारे

लद गया है आसमान का पेड़ इतने तारो से  की अब  पकते है और टूट गिरते हैं  इससे पहले की गिरकर ख़त्म, हो जाए सारे आओ मिलकर तोड़ ले कुछ तारे  बिगबैंग ने जो बीज डाला था,  अरसा लगा होगा पेड़ खड़ा होने में | कितनी ही बारिशो ने सींचा होगा, जो ठन्डे बौर से अब चमकते फल बने है .. सोचता हूँ कि ना जाने पके तारे का स्वाद कैसा होता होगा ! मिठ्ठू ने कहा कि किसी तोते ने भी नहीं चखा है आज तक  घर की सारी  मिर्ची खा कर इतना ही बोला बदमाश ! खैर उम्मीद है आम सा मीठा ही होगा ..  कल रात ही गिरते तारे को ढूंढने भागा था | जब धरती ख़त्म हो गयी, तो रुक गया था | वो तारा किसी और के ग्रह में जा गिरा था | अब ऊंची डगाल से गिरे तारे का अंदाज़ा लगाना आसान भी तो नहीं ... आओ कुछ और ऊंची गुलेल मारें.. इससे पहले की गिरकर ख़त्म, हो जाए सारे, आओ मिलकर तोड़ ले कुछ तारे || बेंगलोर  २६ जुलाई २०१५ 

जीवन की दौड़

फिर आ ही गया जन्मदिन, और मैं अपने सफर को नाप रहा हूँ..  दिन हफ्ते महीने साल दशकों में अपनी यात्रा के पड़ाव ढूंढता हूँ और सोच रहा हूँ की जीवन की इस दौड़ में कौन दौड़ रहा है..  समय या मैं ?? सब कहते हैं की समय के साथ चलो, वरना समय आगे निकल जायेगा..  पर सोचता हूँ कि शायद समय अपनी दौड़ दौड़ रहा हो, और उसे उसके पड़ाव मुझमे मिले! तो समय भी बाध्य होगा मेरा इंतज़ार करने के लिए..  अगर मैं हालात के सबक ले लूँ, तो उसका पड़ाव पार.. वरना रुकता हो वो मेरा इंतज़ार करते हुए।    लेकिन फिर देखता हूँ कि कभी मैं चाहता हूँ समय तेज़ी से गुज़रे पर वो धीमा वो जाता है! और मैं बाध्य हो जाता हूँ वो देखने और और महसूस करने के लिए जो मुझे पसंद भी नहीं! और कभी कितनी भी कोशिश करो, अच्छा समय भी रोके नहीं रुकता! अब जब दिन हफ्ते महीने साल दशकों में अपनी यात्रा के पड़ाव ढूढ़ने निकला, उसी राह में समय मिला, मेरे अनुभवों के फीते से अपने सफर की लम्बाई नापता हुआ..  समझना आसान था, साथ ही दौड़ रहे हैं.. "समय और मैं"।  २ दिसंबर, २०१४...

Letter To Long Lost Friend

एक अर्से से तुमको देखा नहीं दोस्त .. अब इतने दूर हैं कि यादो में भी एक दुसरे का रास्ता नहीं भूलते ! याद तो नहीं कि आखरी बार तुम्हे कब देखा था पर हाँ शक्ल याद है, आवाज़ याद है.. अंदाज़ याद है..  अब भी वैसे ही लगते हो.. मासूम छोटे बच्चे से! कमाल है कि तुम अब भी उतने ही हो, और मैं हूँ कि बढ़ता जा रहा हूँ! ये याद भी बड़ी मज़ेदार चीज़ है, वक्त भी रोककर रख लेती है. वर्ना एक मैं.. जिसके हाथ से वक्त यूँ फिसलता है कि रेत भी शर्मा जाए. कम्बख्त ये वक्त शायद मेरे पास ही यूँ तेल चुपड़ कर आता है,  मानो कुश्ती लड़ने आया हो मुझसे!  हाँ.. वैसे वो लड़ता भी है.. पछाड़ता भी है.. और जैसे ही मैं सोचता हूँ कि अब इसे पकड़कर पटखनी दे दूंगा, सरसराता हुआ हाथ से निकल जाता है..  मेरा बचपन भी यूँही हाथों से कहीं फिसल गया है  शायद तुम्हारी यादों में महफूज़ हो ! क्यूँ न यूँ करैं कि फिर मिलें, और लौटा दें एक दुसरे को  अपना-अपना बचपन.. अपनी-अपनी मासूमियत ! चलो अब आ भी जाओ  एक अर्से से तुमको देखा नहीं दोस्त! ...

माज़ी (Past)

जाने ये क्यूँ हमेशा साए कि तरह मेरे पीछे-पीछे चलता रहता है ! जहाँ से भी मैं गुज़रता हूँ, पिछले हर कदम की मिटटी पोटली में भर लेता है. जीत, हार, बनते-बिखरते रिश्ते, ख़ुशी, हंसी, आंसू, आह, दर्द सब सहेज लेता है, जो सब मैं पीछे फेकता हूँ, वो भी समेट लेता है..  कमबख्त कुछ तो छोड़ दे! जब भी कभी आँख बंद करता हूँ,  किसी बच्चे कि तरह कूद कर सामने आ जाता है, और किसी फेरी वाले की तरह पोटली में से चुन-चुन कर सब दिखाता है. खैर.. कौन समझाए इसे..  अनजाने ही सही, मेरा माज़ी मेरा  दुश्मन भी  है.. दोस्त भी . मई १५, २०१२  पुणे

Engagement ring

अंगूठी न हुई मानो मछली पकड़ने का काँटा है! कितने लम्हे पकड़ लेती है..  पिछली दफा जब तुमने मुझे कहा था की मीठा कम खाओ,  मैं तो किसी सरसराती मछली की तरह बच निकला था. पर अब जब भी कभी मीठा खाने को उठाता हूँ,  कमबख्त वो लम्हा अंगूठी पर पालथी मारे बैठा मुह फुलाकर मुझे चिढाता है..  और याद है वो movie जो इतने जतन से देखने गए थे, और बिलकुल डब्बा निकली थी. कुछ ६०० रुपये  में  अपनी ही बेवकूफी पर "हमारी" पहली हंसी थी वो. फ़ोन चर्चा, street shopping और न जाने कितनी ऐसी यादें, अंगूठी पर design बनकर बैठी हैं, मैं खाली बैठे-बैठे अंगूठी घुमाता जाता हूँ, और कितने ही लम्हों की मछलियाँ साफ़ नज़र आती हैं..  अंगूठी न हुई मानो मछली पकड़ने का काँटा है! कितने लम्हे पकड़ लेती है.. बैंगलोर  २३ - अगस्त - २०१३ 

"शर्मसार"

आसमां से गिरता एक सितारा देखकर जैसे कोई पुराना दुश्मन मिल गया था..  मैं जानता था, कि कई लोग आँखे मूंदे दुआ मांग होंगे .. पर मैं उसकी आँखों में आँखे डाले देखता रहा .. एक टक ! अक्सर बंद पलकों के पीछे गिरते, वो कहीं छुप जाता था पर आज मेरे सामने आँखे झुकाए खड़ा था..  शर्मसार.. वो जानता था मैं उससे क्या कहना चाहता था ख़ामोशी का शोर जैसे उसके कान के परदे चीर रहा था। कुछ देर की चुप्पी तोड़ते हुए मैंने उससे पूछा  "कहाँ थे तुम जब मुझे तुम्हारी ज़रूरत थी ? यूँ तो दधिची बने फिरते हो!! " हाथ जोड़े पहली दफा सर उठाकर वो बोला, "जब मैं आसमान से गिर रहा होता था,  तुम आँखे बंद कर लेते थे। कभी सहारा देने के ख्याल से हाथ बढाया होता, तो अपने हिस्से का आसमान ही दे देता।" ज़मीन पर खड़े-खड़े  ही मैं अपने आप में कई आसमान गिरा.. अब मैं आँखे झुकाए खड़ा था  .. शर्मसार बेंगलोर  १९ - अप्रैल - २०१३