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'Goa'

This poem is about the way I saw goa when we 3 childhood friends (Milind, Sarva & I) visited ' Goa ' some time back.. कुछ बात है इस ज़मीन में, कि यहाँ सब आते हैं.  अपना रंग, अपनी ज़बान, अपनी पहचान पीछे छोड़कर.. कुछ हम जैसे भूरे, जो गोरों कि तरह पानी के अंग्रेजी खेल खेलने आते हैं. और कुछ गोरे जो धुप में लेटकर हमारी तरह भूरा होने कि कोशिश करते हैं.. कम कपड़ों में चमकते जिस्म.. किसी नंगेपन से ज्यादा आजादी दिखाते हैं. जैसे किसी ने बरसों से पहना सामाजिक ज़िम्मेदारी का लबादा उतार दिया हो पानी और शराब यहाँ कुछ यूँ मिले-जुले से लगते हैं, जैसे बचपन से हम ३ इंसान साथ रहते-रहते अब शायद १ ही रह गए हैं.. हम ज़रूर वहां से लौटकर फिर वही हो गए हैं.. जैसे हम पहले थे.. पर वहां हवा, ज़मीन, पानी, आसमान और धूप में     (The 5 elements) खुद कि असलियत से सामना हो जाता है.. कहीं ना कहीं हम खुद को पा लेते हैं  शायद यही कुछ बात है इस ज़मीन में कि यहाँ सब आते हैं.. अपना रंग.. अपनी ज़बान.. अपनी पहचान .. सब पीछे छोड़कर ......

सितारों की उम्र

किताबों में पढ़ा है कि कई  सि तारे हमारी धरती से भी पुराने हैं ... सोचता हूँ  तो याद आती है बरसातों की वो रातें जब बिजली जाया करती थी. रात में मेरे टेबल पर उस बड़ी मोमबत्ती के इर्द-गिर्द पतंगे नाचा करते थे.. मैं कभी पढ़ते-पढ़ते वहीँ टेबल पर सिर रखकर सो जाता था. रात को माँ मुझे बिस्तर पर सोने को कहती और मेरे सोने के बाद मोमबत्ती बुझा देती थी. मैं सुबह उठता तो सिर्फ मोमबत्ती जिंदा रहती और पतंगे जल चुके होते थे.. कुछ गर्मी से आह़त पतंगों  की लाशें मेरी किताब के खुले पन्नों में मिलती थी. अब जब घर में कभी बिजली नहीं जाती, तो मैं अक्सर बालकनी में रात देखने जाता हूँ. आसमान पर हर रात चाँद जलता है और सितारे इर्द-गिर्द नाचते हैं.. मैं अक्सर उनको देखकर खुद-ब-खुद आकर बिस्तर पर सो जाता हूँ. माँ दूर शहर में है, उसे पता नहीं कि मैं सोया हूँ या नहीं.. तो वो उसे जलता ही छोड़ देती ...

एक इल्तजा

शायद मुझे तुम पेड़ समझते हो, बस बोलते हो.. मेरी कभी सुनते नहीं.. शायद सोचते हो कि मेरी कोई उम्मीदें नहीं तुमसे ! जब खुश होते हो, मुझपर झूला डाल लेते हो, और मुझे २ पल कि हंसी का कारण बताकर खुश कर देते हो, फिर वो खुशी मैं तुमसे मांगता रह जाता हूँ, पर तुम नहीं आते.  जब भी परेशानी कि ठण्ड से कपकपाते हो,  मेरे सपनो कि कोई डाल काट कर सुलगा लेते हो.. शायद मेरे सपनो कि कोई एहमियत नहीं तुम्हे ! मैं जानता हूँ कि कभी एक छोटी सी बात पर, फिर किसी परिंदे कि तरह उड़ जाओगे तुम,  अपना दर्द का घोसला मेरी ही किसी डाल पर छोड़कर.. पर उससे पहले मेरी एक इल्तेजा है, एक बार ईमान से हँसकर मुझे गले लगा लेना, फिर ख़ुशी से जल जाऊंगा मैं अरमानो कि किसी भी बेतुकी होली में..... 1 January 2012

दोस्तों के नाम :-)

आसमान की डाल से एक मीठा सितारा पक कर गिरा था. बंद आँखों से.. ख्यालों के पैरों पर उसे पकड़ने को मैं दौड़ा था. दुआ के हाथों से जब उसे उठाया था.. तब मैंने तुम्हे पाया था.. जब राह अंतहीन थी.. और साथी कोई ना था, तकलीफों की तपती राह पर उम्मीदों के पाँव जलने लगे थे. बोझिल आँखों से मैंने अपने लिए भी एक फ़रिश्ते को बुलाया था. तब मैंने तुम्हे पाया था.. कहते हैं दोस्त इंसान नहीं एक आदत होते हैं, आदत.. जिनपर आपका कोई ज़ोर नहीं होता.. जब आदतों से जुड़ने का मेरा भी मौका आया था. तब मैंने तुम्हे पाया था.

Death of the Joker

मैं मुखौटे में छुपा था.. मुखौटे में ही रह गया.. ना मेरे होने की कोई ख़बर थी, ना मेरे ना-होने की कोई ख़बर है.. जो जानता था मुझको, उसने किसी को बताया नही.. फ़िर कोई मुझे जानता नही, तो किसी ने मुझे अपनाया नही.. मैं तनहा ही था .. और अब तनहा ही नही - हूँ .. मैं जोकर ही था.. मर कर भी वही हूँ.. दूसरों के चेहरे पर हसी मुझे अब भी भाति है.. कभी कभार हिचकियाँ मुझे भी आती हैं.. देखने जाता हूँ कभी अपने कपडों में किसी और को.. सुनता हूँ लोग कहते हैं "पहले वाला ज़्यादा अच्छा था। " उनकी यह मायूसी अब भी मुझसे खलती है. जाता हूँ दौड़ कर स्टेज पर और कुछ नया कर दिखाता हूँ.. अब बिना मुखौटे के भी मुझे कोई देख नही सकता। मैं पहले भी अनदेखा था ... मर कर भी वही हूँ । एक चेहरा मुझे याद है.. अब भी उसे दूर से देखने भर को जाता हूँ.. उसके चेहरे पर हँसी अब भी सबसे खूबसूरत लगती है. उसका वो बचपन अब भी है, वो शरारत अब भी है.. पता नहीं उसको मैं याद हूँ या नहीं.. पर मेरे जेहन मे वो अब भी है.. शायद वो कभी सोचती होगी कि मैं कहीं हँस रहा हूँगा, उसे शायद वो कागज़ पर रंगों से बनी मुस्कराहट असली...

जोकर

मैं एक जोकर हूँ। कब ख़ुद के लिए हँसा था, ये याद नही, पर दूसरो के लिए हर पल मैं हँसता हूँ.. दिलों मे तो जगह नही मिलती, पर मैं लोगो के छोटे से वक्त मे बसता हूँ.. ना मेरा कोई दिल है, ना दिल की बात है। ना मुझे कोई आस है, ना मेरी कोई फरियाद है॥ शक्लों को पसंद करने वाली दुनिया मे नही मेरी कोई औकात है.. हाँ बिना शक्ल का.. हँसते मुखौटे के पीछे छुपा मैं एक जोकर हूँ॥ जब इंसानों ने ठुकराया तो कुदरत को दोस्त बनाया, जब कुदरत ने भी ठुकराया तो हँसी को दोस्त बनाया। अपनी छोटी सी खुशी मे और अपने ग़मों पर भी मैं हँसता हूँ.. देखने वालो को मैं हमेशा ही खुश दिखता हूँ। हँसते होठो के बीच मेरे दर्द पर भीगी आँखे ढूंढ़ता हूँ.. मैं एक जोकर हूँ॥ वक्त की बंदिशों मे सब मेरे साथ हँसते रहते हैं, उस वक्त के बाद सिर्फ़ सन्नाटे ही मुझसे कुछ कहते हैं। जब कोई देखता, मैं सिर्फ़ हँसता होता था, कोई नहीं जानता कि सबसे छुपकर मैं कितना रोता था. भगवान भी पत्थरो में छुपकर मुस्कुरा कर मुझे अनसुना कर देता है। मैं... एक जोकर हूँ। २७-०१-२००९ (बंगलौर)

फ्रेंडशिप डे (इवेनिंग)

आसमां लाल सा है, और सूरज अब तक डूबा नही है । ठंडी हवा चल रही है , और खम्बों पर लगी बत्तिया माहौल खुशनुमा कर रही है । टहलते हुए दोस्तों की टोलियाँ बहुत खुश नज़र आती है । पर मैं अकेला उदास खड़ा हूँ । सामने बैठे बच्चे मासूमियत से मुस्कुरा रहे हैं । उनके होठो पर बैठी मुस्कराहट से तुम्हारी याद आई । कहीं तुमने ही तो उस हसीं मे दोस्ती का तोहफा नही भेजा ? सुना है आजकल तुमने कोई नया हुनर सीखा है॥ उस हसी से तुम्हारी खुशी का एहसास तो हो गया मुझको , पर मैं अब भी अकेला उदास खड़ा हूँ । जब तुम्हारी याद बर्दाश्त न हुई तो घुस चला एक किताबो की दूकान मे । कुछ किताबो पर नज़र गई जो हमने कभी साथ पढ़ी थी , और मेरे होठो पे हसी के साथ आखो से एक आंसू छलक गया। निकला वहां से बाहर और सड़क की भीड़ मे खो गया जब रुका और पलट कर देखा तो पाया.. मैं अब भी अकेला उदास खड़ा हु । ०४-०८-०८ (फ्रेंडशिप डे की शाम)